Wednesday, January 11, 2017

मज़हब-ए-गोश्त

आप क्या लेंगी? मटन बिरयानी या चिकन बिरयानी?
आज सोमवार है. तुम मुझे प्लेन बिरयानी दे दो. अलग से मंगवाने की ज़रुरत नहीं... उसी में से निकाल कर दे दो.


आप क्या लेंगे?
मैंने लिया. मटन बहुत टेंडर था. मज़ा आ गया.
मैंने आपके घर के लिए दो पैकेट निकाल दिया है. ज़रूर ले जाइएगा..
अरे नहीं, कल मंगलवार है. कल मैं नहीं खाता.
ओह! फिर आप कैसे निकालेंगे?
क्या...किसे?
मटन वाले खून को? कल इसे अपने शरीर से कैसे निकालेंगे?
आप भी भाभी...

आपको क्या दूँ?
ठंड बढ़ गयी है. अब घर जाऊंगा...मैंने चिकेन बिरयानी का पैकेट ले लिया है. घर पर खा लूंगा..

और आप?

जानती हैं मेरे मायके में कभी भी मुर्गी-अंडा घर के अन्दर नहीं आया. वही देखिए मटन ख़ूब बनता है... लेकिन आज मन नहीं हो रहा. आप बुरा तो नहीं मानेंगी?

नहीं! पर मटन खाते हैं और चिकन-अंडा नहीं... समझ नहीं आया.

(फुसफुसाकर) माँ लोग का तो जानती ही हैं. कभी कोई बोल दिया कि चिकन और अंडा शुद्ध रूप से मुसलमान सब  का है... बस फिर कभी घर में आया ही नहीं.

शुद्ध रूप से?

मतलब और कोई खाए न खाए उ सब तो खाएबे करता है...मटन हिन्दू-मुसलमान दोनों खाता है..इ दोनों का हुआ...

अच्छा! फिर गाय किसकी हुई? हिन्दू की कि मुसलमान की? मुसलमान की...? फिर इतना झगड़ा क्यों?

अरेsss भाभी क्या बोल रही हैं? आप तो दंगा करा देंगी...

अगले दिन मैंने बिरयानी घर ले जाने वाले व्यक्ति को फ़ोन किया. कर्टसी कॉल. खाया कि नहीं, बिरयानी कैसी लगी...ये पूछने के लिए. फ़ोन उठाते ही उन्होंने बताया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं. मेरा दिल धड़कने लगा...कहीं ऐसा तो नहीं कि बिरयानी ख़राब थी!

क्या हुआ? बिरयानी खाकर ये हाल हो गया?
हाँ. सब उसी के बाद हुआ?
पेट ख़राब हो गया?
नहीं, ख़ूब जाड़ा देकर बुख़ार आया...
अरे... अचानक?
भोर में चढ़ा बुख़ार... उसको तो आना ही था. रात में नहाना जो पड़ा.
इतनी ठंड में? क्यों?
घर के अन्दर नॉन-वेज नहीं बनता है... 9 बजे रात में घर के बाहर बैठ कर बिरयानी खाए. सोचे कि कोई देखेगा नहीं. पर घरवाला सब देख लिया...इसलिए फिर शुद्धिकरण मतलब नहाना पड़ा.. तभी घर के अंदर जा पाए...माथा से नहाना पड़ा...इसी से बुख़ार हो गया...


हे भगवान्! 

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