शर्मा आंटी ज़ोर ज़ोर से अपनी बहिन पर चीख़ रही थीं. चीख़ें इतनी तेज़ थीं कि बातें समझ नहीं आ रही थीं. बीच-बीच में कोई-कोई शब्द ज़रूर पकड़ में आता– मजाल, घर, अपवित्र, माँस, मुसलमान, आदि-आदि. पहले चीख एकतरफ़ा थी जो बाद में दो-तरफ़ा हो गयी. अब कुछ नए शब्द जुड़ गए – ढोंगी, ब्रेड, चीनी, हड्डी का चूरा वगैरा. फिर चीखें इस स्तर तक पहुँचीं कि जो इक्के- दुक्के शब्द सुनने में आ रहे थे वे भी ध्वनि में तब्दील हो गए. फिर धड़ाके से दरवाज़ा खुला और मानो चीखों के फ़ोर्स से छोटी बहिन बाहर फेंका गईं. उनके पीछे असंख्य ध्वनियाँ निकलीं जो दरवाज़े के बंद होने के साथ थम गयीं. छोटी बहिन के मुंह से फुंफकार निकली – ‘ढोंगी बाबा... हर रोज़ पता नहीं कितने जीवों को साँस के साथ निगल जाती है और पचा भी जाती है और दंभ करती है वैष्णव शाकाहारी होने का.’
वाह-वाह, मुझे यह सुनकर मज़ा आ गया – मैंने उन्हें खोदना शुरू किया. ‘दरअसल हुआ क्या था? आपकी दीदी इतना भड़क क्यों रही थीं?
“एक नंबर की ढोंगी है, जिसके मन में इन्सान के लिए इतनी घृणा और नफ़रत है, जीव-प्रेम क्या ख़ाक करेंगी.”
“पर हुआ क्या है” मेरा दुष्ट मन तो पूरी बात जानना चाहता था और यहाँ हो रही थी छिटपुट बरसात. “चलिए, पटना मार्किट चला जाए. आपका मन शांत हो जाएगा.”
पटना मार्किट की रौनक ही कुछ और होती है. घुसते ही चाट की दुकान और ज़रा सा अन्दर घुसते ही रौशनी में जगमगाती चूड़ियों की दुकानें और चारों तरफ़ औरतों, दुकानदारों, बच्चों का शोर... 'ये वाला नहीं भईया... वो वाला दिखाइए ना...' 'सवा दो नहीं दो छह न कहे...' 'आइए मैडम इधर आ जाइए...' 'ले लीजिए न, पचासे में दे देंगे 10 मीटर फीता...' ये चमक-दमक और शोर पहले तो मन को सुन्न कर देता है और बाद में शांत. इस बाज़ार का नशा किसी शराब से कम थोड़े ही न है!
हमने पहले चाट खाई और फिर बाज़ार में चकल्लसबाज़ी की. इतने में ही हम थक गए और लस्सी पी कर चित्त को और शांत किया. वहां से हम काली मंदिर गए. मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गंगा नदी को निहारते रहे. मन स्थिर हो गया था!
अब मैंने फिर से उन्हें खोदा. आख़िर इतनी मेहनत मैंने यूँ ही तो नहीं की थी! उनके मन का फोड़ा फूट गया और मवाद धीरे-धीरे बहने लगा.
“अरे कुछ नहीं. केतकी बहुत दिनों से बुला रही थी सो आज मिलने चली गयी थी. लौटते वक़्त उसके पति ने जैविक सत्तू का एक पैकेट पकड़ा दिया. घर आई तो थैले से सारा सामान निकाला. सत्तू का पैकेट भी निकाल कर टेबल पर रख दिया. दीदी ने हाथ में लेकर देखा और बोलीं कि वाह! जैविक सत्तू कहाँ से मिल गया? यहाँ तो सब मिलावटी सत्तू रखता है.”
मैंने कहा, ‘केतकी के यहाँ से. उसके पति ने आजकल जैविक सत्तू बनाने का काम शुरू किया है. उसी ने दिया है.’
ये सुनते ही दीदी के हाथ से सत्तू का पैकेट ऐसे उछला मानो उनके हाथ में किसी ने विषधर थमा दिया हो. मुँह से संस्कार की अर्थी निकलने लगी...
‘छिः छिः राम राम! मुझे अपवित्र कर दिया. अभी-अभी नहा कर निकली थी. फिर से नहाना पड़ेगा. तेरी हिम्मत कैसे हुई उस अधमी के घर का सामान यहाँ लाने की?’
‘मतलब? कोई उसके घर की कढ़ाही में पका हुआ सत्तू तो है नहीं. गाँव से बनकर आया है. इसमें क्या हुआ?’
‘पर तुम तो उसके घर से ही लेकर आयी हो.’
‘तो? तो क्या हुआ?’
‘क्या हुआ? कैसी मूर्खों वाली बात कर रही है. केतकी मुसलमान से शादी करके अशुद्ध हो चुकी है... और तुम कह रही हो क्या हुआ? मेरा पूरा घर अशुद्ध हो गया. राम! राम! अब पूरे घर को पवित्र करना पड़ेगा.
‘क्या बोल रही हो दीदी? केतकी को तुमने गोद में खिलाया है.’
‘हाँ! खिलाया है. लेकिन क्या उसने इस बात का मान रखा? जिस लड़की का यही ठिकाना नहीं कि मरेगी तो जलाएंगे कि दफनाएंगें वो मेरी रिश्तेदार कैसे हो सकती है? मेरे लिए तो वो घोर अशुद्ध और अधर्मी है. उसके घर से आया हर सामान अशुद्ध है. हटाओ सत्तू यहाँ से.’
‘दीदी मूर्ख न बनो. बाज़ार से जो कुछ ख़रीद कर लाती हो तुम्हें पता है उसे किसने बनाया, किस-किस ने छुआ?’
‘सही कह रही हो. नहीं पता होता पर अभी तो पता है न! आँखों-देखी मक्खी नहीं निगली जाती.’
‘ऐसी अनजान न बनो. क्या तुम्हें नहीं पता कि खेतों में काम करने वाले ज़्यादातर लोग दलित होते हैं. उन्हें तो तुम मलेच्छ मानती हो, फिर उनके हाथ से उगा अन्न -सब्ज़ी कैसे खाती हो?’
‘फ़ालतू की बकवास न कर. मैंने कह दिया उस अधम के घर से आया कुछ भी मेरे घर में नहीं रह सकता.’
‘उसके घर से तो मैं भी आई हूँ तो क्या मैं भी घर से चली जाऊं? अच्छा! एक बात बताओ, चीनी तो तुम रोज़ खाती हो, यह जानते हुए कि उसकी सफ़ाई में जानवर की हड्डी का इस्तेमाल होता है. खाती हो ना?’
‘मेरे घर को अपवित्र करके तेरा मन नहीं भरा कि मेरे सामने अब जानवर की हड्डी और मांस की बात कर रही है? इतना तो लिहाज़ कर कि इसी कमरे में भगवान् विराजे हैं.’
‘भगवान् केवल तुम्हारी मूर्ति में नहीं, कण-कण में बसे हैं दीदी. इसका मतलब ये हुआ कि वो जितना अधर्मी के अन्दर हैं उतना ही धर्मी के अन्दरी. उस भोजन अन्दर भी हैं जो धर्मी खाते है और उस के अन्दर भी हैं जो अधर्मी खाते हैं. भगवान् से लिहाज़ कैसा?’
‘बकवास बंद. अभी मैं पूरे समाज को तुम्हारी धृष्टता बताउंगी. तुम मेरे भगवान् को अधर्मी से जोड़ रही हो? मेरे भगवान् पर सवाल उठा रही हो?’
‘मेरा सवाल तो ये है कि तुम्हारा नेटू-बेटू जो सुबह सवेरे 15 ब्रेड का भोग लगाता है उसे कौन बनाता है?’
‘कौन?... अनजाने में हुए गुनाह को भगवान् भी माफ़ करते हैं.’
‘दीदी क्या हो गया है तुम्हें? दर्ज़ी से उसकी जात पूछकर कपड़ा सिलने तो नहीं देती हो न?’
‘मेरा कपड़ा दीदी सिलवा देती हैं. अब वो किस दर्ज़ी को कपड़ा देती हैं मुझे नहीं पता.’
‘वाह! और तुम्हारी चमड़े की चप्पल कैसे बनती है? जानती ही होगी पर मानती नहीं हो. बीमार पड़ती हो तो कैप्सूल खाती ही होगी. ज़रा ये भी पता कर लो कि कैप्सूल का खोल किस चीज़ से बनता है? उसमें किस जानवर की चर्बी का इस्तेमाल होता है?’
‘तुम बात घुमा रही हो. कहाँ मुसलमान के घर से आया यह अपवित्र पैकेट और कहाँ जीवन रक्षा करने वाला कैप्सूल!’
‘मैं बात घुमा नहीं रही तुम फालतू बातों में उलझ कर घूम रही हो. जिस डॉक्टर के पास तुम जाती हो वहाँ हिन्दू- मुसलमान सभी तरह के मरीज़ आते हैं. तो क्या तुम वहाँ जाना छोड़ दोगी?’
‘ये तुम ठीक नहीं कर रही. तुम एक ब्राह्मण की शुद्धता का, उसकी आस्था का मज़ाक उड़ा रही हो.’
‘इस हवा में हर कोई साँस लेता और छोड़ता है... पादता भी है. अगर तुम पादों से भरी हवा को अपने घर में आने से रोक दो तो मैं ये सत्तू का पैकेट यहाँ से उठा लूँगी.’
इसके बाद दीदी ने अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा. चीख़ कर बोलीं, ‘ मेरे भगवान् के सामने तुम छींकने-पादने की बात करती हो! अब तो तुम्हें भगवान् ही देखेगा.’
जिसकी अक़ल पर परदा पड़ा हो अब उसके सामने मैं और क्या तर्क देतीं. हँसकर इतना ही कहा,’ भगवान् तो मुझे हमेशा से देखता रहा है. आगे भी ज़रूर देखेगा.’
मेरी हँसी से दीदी हत्थे से उखड़ गईं. मामला झोंटा-झोंटव्वल तक न पहुँच जाए इसलिए मैं घर से बाहर निकल गई थी.'
तीन चार घंटे बाहर बाज़ार में बिताने के बाद हम शर्मा आंटी के घर के सामने की सड़क पर थे. तब सब सोने की तैयारी में लगे थे.
बाज़ार की भागम-भाग के बाद घर के बरामदे की शांत छत को वे कुछ पलों के लिए एकटक देखती रहीं. कहा, 'जिन हाथों ने मिलकर इस घर को बनाया वे न हिन्दू थे न मुसलमान. वे इंसान के हाथ थे!'