Wednesday, July 5, 2017

कब्ज़ से निर्वाण तक



पता है क्या हुआ?
क्या?
मैं वैष्णो देवी के दर्शन को गयी थी...
अच्छा.
आगे सुन तो कितनी खतरनाक बात हो गई...मैं मरते मरते बची.
क्या हुआ?
हमलोग न दर्शन से लौट रहे थे कि अचानक से मौसम ख़राब हो गया... सब आगे बढ़ गए थे, एक मैं ही पीछे रह गई थी. मैं पैदल आगे बढ़ रही थी. मेरे बगल में एक औरत पालकी से जा रही थी... मौसम तो ख़राब हो गया था. पहाड़ से बड़े-बड़े पत्थर गिरने लगे. पालकी वाले पालकी नीचे रखने लगे. पता नहीं कैसे पालकी का डंडा मेरी नाक से टकराया और मैं सीधा चित्त ज़मीन पर गिर गई और गिरते ही बेहोश हो गई. मेरे गिरते ही ज़ोरदार धमाके की आवाज़ हुई, बाद में मुझे लोगों ने बताया. नहीं नहीं... मेरे गिरने की आवाज़ नहीं थी... एक बड़ा सा पत्थर ठीक मेरे बगल में गिरा था. मैं तो बाल-बाल बची हूँ.
ओह! चलिए सारे ग्रह कट गए. अब सब अच्छा रहेगा!
मुझे तो बहुत डर लग रहा है... क्या पता ये शुरुआत हो और आगे इससे भी बुरा हो!
आपको कब्ज़ हुआ है कभी?
हाँ... क्यों?
कब्ज़ के कितने प्रकार हैं? आप शायद न जानती हों, मैं बताती हूँ...
एक प्रकार होता है जिसमें आप अन्दर घुसते हैं पेट में ज्वालामुखी उमड़ता रहता है, आप घंटों बैठे रहते हैं पर ज्वालामुखी फूट नहीं पाता.
एक में पेट के अन्दर धमाका ख़ूब होता रहता है पर निकलता है बकरी का 3-4 भेनाड़ी
और एक प्रकार है जिसमें डंक चुभने सा दर्द शुरू होता है. ज्वालामुखी भी उफान पर होता है. दर्द धीरे-धीरे इतना बढ़ता है कि लगता है जैसे आप अब मरे कि तब... पसीने में तर-बतर, दर्द से जूझते हुए आप मौत का इंतज़ार कर रहे होते हैं कि अचानक आपकी शंका के विपरीत मौत नहीं कुछ ‘और’ आ जाती है... प्रचंड घड़ घड़ाहट के साथ कड़ी चट्टानें सभी किनारों को चीरती-फाड़ती निकलती हैं. आप दर्द से कराहती हुई इस आशंका से मरी जा रही होती हैं कि आनेवाला समय भी इतना ही कष्टकर होगा. पर होता क्या है? चट्टानों के दरकने के फ़ौरन बाद ही लावा का उदगार शुरू होता है... और तबतक नहीं रुकता जबतक आपका चित्त निर्मल न हो जाए. और थोड़ी ही देर में सब शीतल, सब शांत हो जाता है.
आप भी अपनी घटना को ऐसे ही देखें, कब्ज़ नंबर तीन के माफ़िक. शुरु में घोर कष्ट पर आगे सब कुछ शीतल और शांत! 
निर्वाण, महानिर्वाण, परिनिर्वाण, सबकी अनुभूति सब एक साथ हो जाती है. फिर ऐसे अध्यात्मिक अनुभव के बाद तीर्थ करने की क्या आवश्यकता?