Wednesday, December 14, 2016

सवाल डर सवाल


तुममें एक ही चीज़ की कमी है और वह है ‘धीरज’.  तुम सीता को क्यों नहीं देखती?  अहिल्या को क्यों नहीं देखती? इनमें धीरज था, सब्र था. आज देखो, दुनिया इन्हें कितना मान देती है!’

‘कितनी बार बताऊँ सीता और अहिल्या ने जो किया ग़लत किया. ऐसी परंपरा चला दी जिसका हर्जाना हम औरतें आज तक भर रही हैं. इन्हें तो dialogue करना था, संवाद करना था. ये बस गर्दन हिलाने के लिए पैदा नहीं हुई थीं. सीता को राम से कहना ही नहीं था, ‘जी स्वामी! वन चलिए’. कहना था, इस परिस्थिति में बात करने की ज़रुरत है. आप माते कैकेयी से कहें कि हम बीच का रास्ता निकालना चाहते हैं. वे भरत को राजा बनाना चाहती हैं, बना दें. उसके लिए हमें जंगल जाने की ज़रुरत नहीं. हम कहीं और भी जा सकते हैं. ऐसे में ज़रुरत पड़ने पर आप भरत की मदद भी कर पाएंगे और लक्ष्मण को भी इतने साल उर्मिला से अलग नहीं रहना पड़ेगा. कहने को वनवास हमें मिला है पर दरअसल ये लक्ष्मण और उर्मिला का वनवास है. ज़रा उनकी पीड़ा के बारे में सोचिए!’

अब ये तुम बताओगी कि सीता को क्या बोलना चाहिए था? फिर दशरथ के वचन का क्या होता? उनकी मान-मर्यादा कहाँ रह जाती?

‘काश कि ऐन वक़्त पर दिमाग़ ने काम नहीं किया होता! आख़िर ब्राह्मण किस दिन के लिए पैदा हुए हैं? उन्हें ‘ब्राह्मण राज’ को बुलाना चाहिए था. वो उन्हें इसका ‘काट’ बता सकता था. बता सकता था कि कितने सौ मुर्गे-मुर्गियां, गाय- बैल वगैरह लेकर और कितने हज़ार एकड़ ज़मीन लेकर कौन सा यज्ञ कराया जा सकता है जिससे वचन का मान भी रह जाए और वनवास को भी न जाना पड़े. बता सकता था कि कैसे चौदह दिन सांकेतिक चौदह साल का हो सकता है.’

तुम ये तो सोचो कि अगर राम जंगल नहीं जाते तो रावण का वध कैसे होता?’

‘रावण की हत्या ज़रूरी ही क्यों थी? केवल इसलिए कि वह शुद्ध आर्य नहीं था? वैसे वह भी शिव का भक्त था, था न? और शिव ने तो उसे वरदान भी दिया था. क्या शिव को पता ही नहीं चल पाया कि उनका भक्त कितना धूर्त और अमर्यादित है? क्या भक्त ने भगवान् ने ठग लिया था? या शिव ने जानते बूझते ऐसे भक्त को वरदान दे दिया? क्या भगवान् ऐसा करते हैं?

और फिर रावण सच में मर गया क्या? नहीं न! मालूम है क्यों? क्योंकि यहाँ भी वध की नहीं ‘डायलॉग’ की ज़रुरत थी. कहते हैं रावण के मन में अहंकार था. महाभारत पढ़िए तो पता चलेगा दुर्योधन के मन में भी अहंकार था. अहंकार के नाम पर रावण मार दिया गया. दुर्योधन मार दिया गया. मगर अब भी कितने अहंकारी और कुंठित मन के लोग हमारे आस पास हैं. ज़रा सोच कर देखिएगा ये इंसानों के साथ कैसा सलूक करते हैं? बीमारी जड़ में हो तो टहनी काट-काट कर कोई फ़ायदा नहीं.

अरे, अंगुलीमाल  का ह्रदय परिवर्तन हो गया और वह डाकू से ऋषि बन गया. फिर रावण और दुर्योधन का ह्रदय परिवर्तन कराने में ये भगवान् लोग फ़ेल कैसे हो गए? हजारों साल बाद एक इंसान पैदा होता है जो ‘अहिंसा’ के दम पर देश मुक्त करा देता है. हजारों आहत मन में से घृणा और बदले जैसे विकारों को TRC के ज़रिये मुक्त कर देता है. और भगवान् लोग चूक गए. ऐसे में इनके भगवान् होने पर संदेह नहीं होता है?

राजा अशोक का ह्रदय युद्ध का वीभत्स रूप देख रो उठता है, वो हिंसा त्याग देते हैं. पर अपने ये भगवान् लोगों का युद्ध के बाद क्या संदेस था? राम के ऊपर तो ऐसा दुष्प्रभाव पड़ा कि जो तकलीफ़ रावण ने सीता को नहीं दी सो उन्होंने दे डाली. महाभारत में सबके मारे जाने के बाद, युद्ध की समाप्ति के बाद कितनी सुख-शांति थी मुझे नहीं मालूम. अगर आपको मालूम है तो मुझे बताएं.’

 ‘तुम भगवान् के अस्तित्व को चुनौती दे रही हो.’

‘आपका भगवान् इतना डरपोक क्यों है जो सवाल पूछते ही डर जाता है? आजकल के राजे-मंत्री भी सवाल की संस्कृति से ख़फ़ा हैं.

देखिए, हम आदि मानव से अभी के इंसान तक पहुंचे हैं. हमारे सोचने समझने की शक्ति, इच्छाएं, माहौल सब कुछ बदल गया है. ऐसे में भगवान् की पुरातन व्याख्या और महात्मय से काम नहीं चलेगा. नए के लिए जगह बनानी होगी. अगर पुराने से लगाव बहुत ज़्यादा है तो कोई बात नहीं उसी में Modification कीजिए. मगर कीजिए.’

तुम अजीब भाषा में बात कर रही हो. ऐसा करके तुम सारे समाज को अपने खिलाफ़ खड़ा कर लोगी.’

‘सवाल समाज को आगे बढ़ाते हैं. मेरे सवाल करने से आप इतना परेशान हो रही हैं क्योंकि शायद आपने भी यही सीखा है कि औरत को, ‘अच्छी औरत’ को सवाल नहीं करना चाहिए. ज़रा सोचिए अगर द्रौपदी ने सही समय पर सवाल किया होता तो उसे पांच भाइयों में बंटना नहीं पड़ता!

एक मिनट ठहर कर सोचिए कि हमारे पूछने से समाज डरता क्यों है? सोचनेवाले के मन में सवाल तो आते ही हैं. समाज हमारे सोचने से इतना क्यों डरता है? हमारे पूछने को, हमारे सोचने को अपने खिलाफ़ होना क्यों समझता है? उसे तो क़ायदे से इन सवालों के जवाब देने चाहियें, संवाद करना चाहिए... 

और  मैं यही चाहती हूँ कि संवाद हो. 

और इससे अगर कोई जड़ मान्यताएँ टूट जाती हैं, असंवेदनशील भावनाएँ आहत होती हैं तो इसकी मुझे बिलकुल भी परवाह नहीं’